सोमवार, 21 मार्च 2016

होली तो हो ली

होली तो हो ली
कैफ़े में बैठा उत्सव शीतल पेय के घूँट भर रहा था. सुबह स्काइप पर देश में अपने घर पर हो रही धमाचौकड़ी देखने के बाद से ही उसका मन उचाट था. भैया-भाभी, भतीजे-भतीजी,बहन के रंग पुते चेहरे, पिता के धवल कुरते पर पड़ीं नीली-पीली धारें, माँ की गुझिया थामें साफ़ हथेलियाँ और अंखियों के कोर पर छलक आयें समंदर ने उसके मन को उद्वेलित कर दिया था. अपने नाम के अनुरूप ही उत्सव को सभी उत्सवों से प्यार था. उसका मन तभी दुखी हो गया था जब उसे होली से बस एक महीने पहले ही यहाँ विदेश में एक प्रोजेक्ट के लिए भेजा गया था. वर्षों से चली आ रही परिपाटी कि होली पूरा परिवार मिल कर मनायेगा इस वर्ष टूट गया था. नया होने की वजह से अभी किसी भारतीय से कोई खास परिचय भी नहीं हुआ था. कैफे के कोने में बैठा वायलिन बजा रहा वादक कोई रोती हुई सी धुन से माहौल में मनहूसियत घोल रहा था. तभी उसके बगल से केक ले कर जा रहें एक बुजुर्ग फिसल गएँ और सामने से आइसक्रीम की बड़ी सी प्लेट थामे लड़की से टकरा गएँ. पहले केक उत्सव के चेहरे पर गिरा या आइसक्रीम, ये सोचने की बात नहीं थी पर गिरा दोनों उसी पर और उसके हाथ में थामा हुआ कोल्ड ड्रिंक्स ने छलकते हुए बुजुर्ग और लड़की दोनों को भिंगो दिया. अगले ही क्षण तीनों जोर जोर से हंस रहें थे. अचानक वायलिन वादक जोर जोर से एक खुशनुमा धुन बजाने लगा, जाने क्यूँ उत्सव को वह रंग बरसे भींगे चुनर वाली .... की धुन सा महसूस हो रहा था. आखिर होली तो हो ली थी.


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