गुरुवार, 21 मई 2015

लघु कथा -23 इज्जत -बदलती परिभाषा

इज्जत -बदलती परिभाषा 


                       जैसे ही गली के नुक्कड़ से अज़ान शुरू हुए ,रेहाना पसीने से तर ब तर होने लगी ,हाथ में पकड़ा गिलास गिर पड़ा और सिकुड़ कर चादर ओढ़ सोने लगी। पिछले दो साल से उसकी दोस्त गीता देख रही थी,गली के नुक्कड़ से जब गुजरती हैं दोनों, रेहाना अपनी पसीजती हथेलियों से उसे थाम काँपती रहती है। 
                    गीता मनोविज्ञान में ही एमए कर रही थी, रेहाना को अपना प्रथम मरीज समझते हुए उसने उसे कुरेदना शुरू किया। थोड़े प्यार और हमदर्दी के मलहम से हृदय का नासूर फूट पड़ा। बहते हुए मवादों ने २०-२१ साल की रेहाना को पांच वर्ष की उम्र में पहुंचा दिया जब मस्जिद की पाक दीवारों के दरम्यान मौलवी ने उसके बचपन को कुचला था और पार्श्व में हो रही अज़ान की ध्वनि ने कंठ अवरुद्ध। इज्जत की दुहाई ने उसे ही गुनहगार और कलंकित मानने को मजबूर किये रखा और तैयार हुई एक नास्तिक और आत्महीन व्यक्तित्व की स्वामिनी। 
                       वक़्त लगा पर गीता अपने प्रथम मरीज को ये समझाने में सफल हुई कि समाज बलात्कारी के सरंक्षण हेतु दुष्कर्म को नारी स्मिता से जोड़ एक विचित्र परिभाषा गढ़े बैठा है। अपराधी चोर होता है ना कि जिसके घर चोरी हुई है ,वह। 
काले बदल छंट चुके थे और खिली धूप निकली हुई थी,दोनों सखियाँ गली के नुक्कड़ से गुजर रहीं थीं ,रेहाना की खिलखिलाती हंसी ने अज़ान को अनसुना कर दिया था। गीता अपने पहले मरीज से अपनी फीस वसूल रही थी - उसकी हंसी।




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